Gorkha Regiment : Introduction
“अगर कोई आदमी कहे कि उसे मरने का डर नहीं, तो वो या तो झूठ बोल रहा है — या फिर गोरखा है।”
— फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ, जिन्हें खुद ‘सैम बहादुर’ कहा जाता था
भारतीय सेना की कई रेजिमेंट्स ने देश की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन Gorkha Regiment का नाम सुनते ही मन में एक ऐसे सैनिक की छवि उभरती है जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी पीछे हटना नहीं जानता। हाथ में पारंपरिक खुखरी (Khukri), चेहरे पर दृढ़ संकल्प और देश के प्रति अटूट निष्ठा—यही गोरखा सैनिकों की पहचान है।
यदि आप NDA, CDS या भारतीय सेना में करियर बनाने की तैयारी कर रहे हैं, या भारतीय सैन्य इतिहास में रुचि रखते हैं, तो यह लेख आपको Gorkha Regiment से जुड़ी हर महत्वपूर्ण जानकारी देगा।
Gorkha Regiment क्या है?
Gorkha Regiment भारतीय सेना की सबसे प्रतिष्ठित पैदल सेना (Infantry) रेजिमेंटों में से एक है। इसकी पहचान असाधारण साहस, अनुशासन, कठिन परिस्थितियों में लड़ने की क्षमता और अपनी पारंपरिक खुखरी के कारण है।
आज भारतीय सेना में गोरखा सैनिक मुख्य रूप से Gorkha Rifles की विभिन्न रेजिमेंटों में सेवा देते हैं। इनमें भारतीय नागरिकों के साथ-साथ भारत-नेपाल संधि के अंतर्गत नेपाल के योग्य नागरिक भी भर्ती किए जाते हैं।
गोरखा सैनिकों का प्रसिद्ध युद्धघोष—
“जय महाकाली, आयो गोरखाली!”
युद्धभूमि में उनके आत्मविश्वास और मनोबल का प्रतीक माना जाता है।



Gorkha Regiment का इतिहास: एक युद्ध से शुरू हुई दोस्ती
गोरखा रेजिमेंट की कहानी शुरू होती है 1814-16 के एंग्लो-नेपाली युद्ध से। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिक जब नेपाली पहाड़ियों में गोरखा योद्धाओं से टकराए, तो उन्हें एहसास हुआ कि ये लड़ाके साधारण नहीं हैं। खलंगा के किले की लड़ाई में मात्र 600 गोरखा योद्धाओं ने हजारों ब्रिटिश सैनिकों को रोक दिया और ब्रिटिश जनरल गिलेस्पी खुद इस लड़ाई में मारे गए।
दुश्मन की बहादुरी से इतने प्रभावित हुए अंग्रेज कि सुगौली संधि (1816) के बाद उन्होंने गोरखाओं को अपनी सेना में भर्ती करना शुरू किया। 24 अप्रैल 1815 को पहली गोरखा बटालियन “नसीरी रेजिमेंट” के रूप में स्थापित की गई — और तभी से एक ऐसी सैन्य परंपरा की नींव पड़ी जो आज भी अटूट है।
Gorkha Regiment की पहचान
| विशेषता | जानकारी |
|---|---|
| शाखा | Infantry |
| प्रसिद्ध हथियार | Khukri |
| युद्धघोष | जय महाकाली, आयो गोरखाली |
| विशेषता | High Altitude Warfare |
| भर्ती | भारत एवं नेपाल |
| पहचान | बहादुरी, अनुशासन, निष्ठा |
Gorkha Regiment क्यों है इतना प्रसिद्ध?
भारतीय सेना में लगभग हर रेजिमेंट की अपनी विशिष्ट पहचान है, लेकिन Gorkha Regiment को अलग बनाती हैं उसकी परंपराएँ और युद्ध कौशल।
इसके पीछे कई कारण हैं—
- कठिन पर्वतीय क्षेत्रों में लड़ाई का अनुभव
- अत्यधिक शारीरिक क्षमता
- कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने की कला
- अनुशासन और टीम भावना
- साहसिक अभियानों में उत्कृष्ट प्रदर्शन
- खुखरी के साथ निकट युद्ध (Close Combat) में दक्षता
यही कारण है कि गोरखा सैनिकों को विश्व की सबसे बहादुर सैन्य इकाइयों में गिना जाता है।
Gorkha Regiment की प्रसिद्ध खुखरी


यदि गोरखा सैनिक की कोई सबसे बड़ी पहचान है, तो वह उसकी खुखरी है।
खुखरी केवल एक हथियार नहीं बल्कि सम्मान, परंपरा और साहस का प्रतीक है।
इसकी घुमावदार धार इसे सामान्य चाकू या तलवार से अलग बनाती है। आधुनिक युद्ध में भले ही अत्याधुनिक हथियारों का उपयोग होता हो, लेकिन खुखरी आज भी गोरखा सैनिकों की वर्दी और सैन्य परंपरा का अभिन्न हिस्सा है।
खुखरी की विशेषताएँ
- मजबूत स्टील से निर्मित
- घुमावदार ब्लेड
- निकट युद्ध के लिए अत्यंत प्रभावी
- औजार और हथियार—दोनों के रूप में उपयोगी
- गोरखा परंपरा का प्रतीक
Gorkha Regiment : भर्ती प्रक्रिया
भारतीय सेना में Gorkha Regiment की भर्ती सामान्य पैदल सेना की तरह ही विभिन्न प्रवेश योजनाओं के माध्यम से होती है।
कहाँ से आते हैं गोरखा सैनिक?
गोरखा सैनिक मुख्यतः दो स्रोतों से आते हैं — नेपाल की पहाड़ी जनजातियाँ (मगर, गुरुंग, लिम्बू, राई, सुनवार आदि) और भारत के गोरखा समुदाय जो पश्चिम बंगाल (दार्जिलिंग), हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर-पूर्व में बसे हैं। अधिकारी पद पर भारत के किसी भी हिस्से से उम्मीदवार आ सकते हैं।
प्रशिक्षण केंद्र
चुने गए रंगरूटों को प्रमुख रूप से गोरखा रेजिमेंटल सेंटर, सबाथू (हिमाचल प्रदेश) में प्रशिक्षित किया जाता है, जो 1815 से लगातार चल रहा है — यह दक्षिण एशिया के सबसे पुराने सैन्य प्रशिक्षण केंद्रों में से एक है। शिलॉन्ग में भी गोरखा ट्रेनिंग सेंटर है।
49 सप्ताह की कठोर ट्रेनिंग
भर्ती के प्रमुख माध्यम
- Agniveer Entry
- Soldier General Duty (समय-समय पर लागू भर्ती प्रक्रिया)
- NDA
- CDS
- Indian Military Academy
- Officers Training Academy
नेपाल के नागरिकों के लिए भी भारत-नेपाल समझौते के अनुसार निर्धारित भर्ती केंद्रों पर चयन प्रक्रिया आयोजित की जाती है।
भर्ती में सामान्यतः निम्न चरण शामिल होते हैं—
- शारीरिक दक्षता परीक्षा
- मेडिकल परीक्षण
- लिखित परीक्षा (जहाँ लागू हो)
- दस्तावेज़ सत्यापन
- मेरिट सूची
प्रमुख युद्धों में गोरखा रेजिमेंट का शौर्य
1947-48: कश्मीर का पहला युद्ध
स्वतंत्रता के तुरंत बाद जब पाकिस्तानी कबायली लड़ाकों ने कश्मीर पर हमला किया, गोरखा सैनिकों को तुरंत तैनात किया गया। उन्होंने जम्मू-कश्मीर में दुश्मन के आक्रमण को रोकने में अहम भूमिका निभाई।
1962: चीन के खिलाफ अदम्य साहस
चीन-भारत युद्ध में मेजर धनसिंह थापा (1/8 गोरखा राइफल्स) पांगोंग झील के पास अपनी चौकी पर चीनी सेना के तीन लगातार हमलों को उन्होंने महज मुट्ठी भर सैनिकों के साथ रोका। जब सभी साथी शहीद हो गए, तब भी वे लड़ते रहे। इसी अदम्य साहस के लिए उन्हें परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
1971: बांग्लादेश मुक्ति — ऐतिहासिक हेलीबोर्न हमला
4/5 गोरखा राइफल्स ने सिलहट की लड़ाई में भारतीय सेना का पहला हेलीबोर्न हमला किया — एक ऐसी सैन्य उपलब्धि जो इतिहास में दर्ज हो गई। 1/5 गोरखा राइफल्स ने सेहजरा बल्ज में पाकिस्तान की पूरी एक बटालियन को परास्त किया।
1999: कारगिल — “आयो गोरखाली!” की गूंज
कारगिल युद्ध में 1/11 गोरखा राइफल्स ने बतालिक सेक्टर में खालूबार रिज पर कब्ज़ा करने में निर्णायक भूमिका निभाई। लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय ने चारों ओर से घिरे होने के बावजूद दुश्मन की चौकियाँ एक-एक करके ध्वस्त कीं। घायल होने पर भी वे आगे बढ़ते रहे जब तक कि वीरगति को प्राप्त नहीं हुए। उन्हें मरणोपरांत परम वीर चक्र दिया गया।
परम वीर चक्र विजेता — गोरखा रेजिमेंट के वीर सपूत
Gorkha Regiment ने अपनी बटालियन संख्या के अनुपात में किसी भी अन्य भारतीय रेजिमेंट से सबसे अधिक परम वीर चक्र अर्जित किए हैं।
- कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया — परम वीर चक्र (मरणोपरांत), 19611/3 गोरखा राइफल्स के NDA के पहले PVC विजेता। कांगो (अब DR कांगो) में UN शांति मिशन में संख्या में कम होने के बावजूद दुश्मन की गतिविधि रोकी और वीरगति पाई।
- मेजर धनसिंह थापा — परम वीर चक्र, 19621/8 गोरखा राइफल्स। 1962 के भारत-चीन युद्ध में लद्दाख की सृजाप चौकी पर चीनी सेना के तीन हमलों को अकेले रोका। “अंतिम आदमी, अंतिम गोली” की मिसाल।
- लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय — परम वीर चक्र (मरणोपरांत), 19991/11 गोरखा राइफल्स। कारगिल में खालूबार टॉप पर चढ़ाई के दौरान चार दुश्मन बंकरों को नष्ट किया, चार बार घायल हुए लेकिन रुके नहीं। “न छोड़ूँगा — न छोड़ने दूँगा” उनका अंतिम संकल्प था।
विरासत, संस्कृति और वर्तमान भूमिका
सांस्कृतिक पहचान
गोरखा सैनिक की पहचान उसकी चौड़ी-किनारी वाली “गोरखा टोपी”, परंपरागत बेल्ट, और बैगपाइप बैंड से होती है। गोरखा दिवस हर साल मनाया जाता है जिसमें शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि दी जाती है। दार्जिलिंग के बाटासिया लूप में स्थित गोरखा वॉर मेमोरियल उनके बलिदान का अमर प्रतीक है।
वर्तमान तैनाती
आज गोरखा सैनिक भारतीय सेना में पारंपरिक युद्ध के साथ-साथ सियाचिन ग्लेशियर पर ड्यूटी, आतंकवाद-रोधी अभियान (जम्मू-कश्मीर), UN शांति मिशन (लेबनान, सियरा लियोन), और आपदा राहत कार्य में भी अग्रणी भूमिका निभाते हैं।
भारत-नेपाल संबंधों का सेतु
Gorkha Regiment सिर्फ एक सैन्य इकाई नहीं — यह भारत और नेपाल के बीच दो सदियों पुराने भाईचारे का प्रतीक है। लगभग 30,000 नेपाली गोरखा भारतीय सेना में सेवारत हैं। सेवानिवृत्ति के बाद ये सैनिक भारत में बसकर अपने समुदायों में सम्मानित स्थान पाते हैं।
निष्कर्ष: “आयो गोरखाली” की गूंज अनंत तक
Gorkha Regiment सिर्फ एक सैन्य दल नहीं — यह एक जीती-जागती विरासत है। 1815 में नसीरी रेजिमेंट से शुरू होकर 2024 की 39 सक्रिय बटालियनों तक, यह रेजिमेंट हर युद्ध में, हर मोर्चे पर, हर कठिनाई में अपराजित रही है।
खुखरी की धार और “कायर हुनु भन्दा मर्नु राम्रो” के मंत्र के साथ जीने वाले ये योद्धा हमें सिखाते हैं कि बहादुरी किसी भूगोल की मोहताज नहीं होती — वो खून में होती है, संस्कारों में होती है, रेजिमेंट के गौरव में होती है।
अगली बार जब कोई आपसे पूछे कि दुनिया के सबसे बहादुर सैनिक कौन हैं — तो बेझिझक कहें: “आयो गोरखाली!”
Gorkha Regiment में भर्ती एवं उससे सम्बंधित अन्य परीक्षा की जानकारी के लिए हमारे Indian Army Entrance Exam 2026 इस ब्लॉग को पढ़ें ।
FAQ
Gorkha Regiment भारतीय सेना की एक elite infantry regiment है जो मुख्यतः नेपाली मूल के गोरखा सैनिकों से मिलकर बनी है। वर्तमान में भारतीय सेना में 7 Gorkha Regiments और 39 सक्रिय बटालियन हैं।
Gorkha Regiment की नींव 1814-16 के Anglo-Nepalese War के बाद पड़ी। ब्रिटिश अधिकारी गोरखाओं की बहादुरी से इतने प्रभावित हुए कि 24 अप्रैल 1815 को पहली गोरखा बटालियन “नसीरी रेजिमेंट” के नाम से स्थापित की गई।
Gorkha Regiment में भर्ती के लिए उम्मीदवार को Army Open Rally या Nepal Gorkha Recruitment के ज़रिए आवेदन करना होता है। शारीरिक दक्षता, लिखित परीक्षा और मेडिकल टेस्ट पास करने होते हैं। चयन दर 10% से भी कम है। सबाथू (हिमाचल प्रदेश) में 49 सप्ताह की कठोर ट्रेनिंग दी जाती है।
खुखरी एक घुमावदार, भारी धार वाला पारंपरिक नेपाली चाकू है जो हर गोरखा सैनिक की पहचान है। यह युद्ध में उपयोग होने के साथ-साथ रोज़मर्रा के कामों में भी इस्तेमाल होता है। परंपरा के अनुसार एक बार म्यान से निकली खुखरी बिना खून चखे वापस नहीं जाती।
Gorkha Regiment का मोटो है — “कायर हुनु भन्दा मर्नु राम्रो” जिसका हिंदी अर्थ है “कायर बनकर जीने से बेहतर है मर जाना।” इनका रणघोष है — “जय महाकाली — आयो गोरखाली!”
Gorkha Regiment को अब तक 3 परम वीर चक्र मिले हैं — कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया (1961, कांगो), मेजर धनसिंह थापा (1962, भारत-चीन युद्ध), और लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय (1999, कारगिल)। बटालियन संख्या के अनुपात में यह किसी भी भारतीय रेजिमेंट से सर्वाधिक है।
हाँ, परंपरागत रूप से नेपाली नागरिक भारतीय Gorkha Regiment में भर्ती होते रहे हैं। हालांकि 2020 से Nepal सरकार ने Agniveer योजना को लेकर आपत्ति जताते हुए नई भर्ती पर रोक लगा रखी है। भारतीय गोरखा (दार्जिलिंग, उत्तराखंड, हिमाचल) की भर्ती अभी भी जारी है।
इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी बहादुरी, कठिन पर्वतीय युद्ध क्षमता और extreme conditions में लड़ने की क्षमता है।
1999 के कारगिल युद्ध में 1/11 Gorkha Rifles ने बतालिक सेक्टर में खालूबार रिज पर कब्ज़ा करने में निर्णायक भूमिका निभाई। लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय ने चार बार घायल होने के बावजूद दुश्मन के बंकर ध्वस्त किए और वीरगति प्राप्त की।
भारतीय सेना में कुल 7 Gorkha Regiments हैं — 1, 3, 4, 5 (Frontier Force), 8, 9 और 11 गोरखा राइफल्स। इनमें 39 बटालियन हैं और लगभग 30,000 गोरखा सैनिक सेवारत हैं।


