भारत में जब भी सेना के सबसे महान और सम्मानित अधिकारियों की बात होती है, तो “Field Marshal” का नाम सबसे ऊपर आता है। यह सिर्फ एक रैंक नहीं, बल्कि दशकों की वीरता, नेतृत्व, रणनीति और राष्ट्रसेवा का प्रतीक है। भारतीय सेना के इतिहास में अब तक केवल दो अधिकारियों को ही यह सम्मान मिला है — Field Marshal सैम मानेकशॉ and Field Marshal के.एम. करियप्पा ।
यह दो नाम भारतीय सैन्य गौरव के पर्याय हैं।
आज के इस लेख में हम भारत के सबसे सर्वोच्च सैन्य सम्मान की पूरी कहानी जानेंगे
Field Marshal — भारत का सर्वोच्च सैन्य पद
भारतीय सेना में Field Marshal पांच सितारा (Five-Star) और सर्वोच्च पद है। यह इतना दुर्लभ है कि स्वतंत्र भारत के 75 से अधिक वर्षों के इतिहास में केवल दो अधिकारियों को यह सम्मान मिला है। यह सामान्य पदोन्नति से नहीं मिलती, बल्कि असाधारण सैन्य नेतृत्व और राष्ट्र के लिए ऐतिहासिक योगदान देने पर प्रदान की जाती है।
नौसेना में इसके समकक्ष पद “एडमिरल ऑफ द फ्लीट” और वायु सेना में “मार्शल ऑफ द एयर फोर्स” होता है।
यह पद सक्रिय सेवा से बड़ा है — एक Field Marshal कभी सेवानिवृत्त नहीं होता। वह जीवनभर भारतीय सेना का अभिन्न अंग रहता है।
1. Field Marshal सैम मानेकशॉ — “सैम बहादुर”
भारत के पहले Field Marshal · 1973
सैम होर्मुसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ
जन्म: 3 अप्रैल 1914, अमृतसर · निधन: 27 जून 2008 · पद ग्रहण: 1 जनवरी 1973
पुरस्कार: पद्म विभूषण, पद्म भूषण, मिलिट्री क्रॉस (ब्रिटिश)


शुरुआती जीवन
जन्म: 3 अप्रैल 1914
स्थान: अमृतसर, पंजाब
शिक्षा: इंडियन मिलिट्री अकादमी, देहरादून
वे भारतीय सेना के पहले बैच के अधिकारियों में शामिल थे।
“अगर कोई व्यक्ति कहता है कि उसे मौत का डर नहीं, तो वह या तो झूठ बोल रहा है, या फिर वह गोरखा है।”
— फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ
1971 का युद्ध — इतिहास का सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण
जब 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की स्थिति बनी, तब सैम मानेकशॉ भारतीय सेना प्रमुख थे।
उन्होंने महीनों की कठोर तैयारी की। दिसंबर 1971 में जब युद्ध शुरू हुआ, तो मात्र 13 दिनों में भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान को मुक्त करा लिया। 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तान के जनरल नियाज़ी ने लगभग 93,000 सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण किया — यह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण था। उनकी रणनीति और धैर्य ने भारत को निर्णायक जीत दिलाई। इसी ऐतिहासिक विजय से बांग्लादेश का जन्म हुआ।
Field Marshal की उपाधि
1973 में उन्हें भारत का पहला Field Marshal बनाया गया।
2. Field Marshal के.एम. करियप्पा – स्वतंत्र भारत के पहले सेनाध्यक्ष
भारत के दूसरे Field Marshal · 1986
कोडंडेरा मडप्पा “किपर” करियप्पा
जन्म: 28 जनवरी 1899, कुर्ग (कर्नाटक) · निधन: 15 मई 1993
पद ग्रहण: 1 अप्रैल 1986 · भारत के पहले भारतीय सेनाध्यक्ष (1949)
भारतीय सेना के उन महान अधिकारियों में गिने जाते हैं जिन्होंने स्वतंत्र भारत की सेना की नींव मजबूत की।
उन्हें भारतीय सेना का पहला Commander-in-Chief बनने का गौरव भी प्राप्त है।


इतिहास बनाने वाला क्षण — 15 जनवरी 1949
15 जनवरी 1949 — यह तारीख भारतीय सैन्य इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखी गई। इस दिन जनरल के.एम. करियप्पा ने ब्रिटिश जनरल सर फ्रांसिस बुचर से भारतीय सेना की कमान अपने हाथों में ली और स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय सेनाध्यक्ष (Commander-in-Chief) बने। आज यही दिन थल सेना दिवस के रूप में मनाया जाता है।
कर्नाटक के कुर्ग (कोडागु) जिले में जन्मे करियप्पा ने मद्रास विश्वविद्यालय से पढ़ाई की और फिर Sandhurst Royal Military College (इंग्लैंड) से प्रशिक्षण प्राप्त किया। वे द्वितीय विश्वयुद्ध में बर्मा, ईरान, इराक और मध्यपूर्व के मोर्चों पर लड़े।
1947 का भारत-पाक युद्ध और कश्मीर की रक्षा
1947 में जब पाकिस्तान समर्थित कबाइली लड़ाकों ने कश्मीर पर हमला किया, तब करियप्पा की रणनीतिक कुशलता ने कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखा। उन्होंने पश्चिमी मोर्चे पर सेना की कमान सँभाली और वहाँ भारत की निर्णायक स्थिति सुनिश्चित की।
“देश के लिए जीना सीखो, मरना तो सब जानते हैं।”
— फील्ड मार्शल के.एम. करियप्पा
Field Marshal की उपाधि — देर से मिला सम्मान
करियप्पा 1953 में सेवानिवृत्त हुए और ऑस्ट्रेलिया व न्यूज़ीलैंड में भारत के उच्चायुक्त भी रहे। लेकिन Field Marshal का सर्वोच्च सम्मान उन्हें जीते-जी मिला — 1 अप्रैल 1986 को, जब वे 87 वर्ष के थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें यह उपाधि प्रदान की। 1993 में 94 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।
दोनों Field Marshals — एक तुलनात्मक दृष्टि
| विशेषता | सैम मानेकशॉ | के.एम. करियप्पा |
|---|---|---|
| जन्म | 3 अप्रैल 1914, अमृतसर | 28 जनवरी 1899, कुर्ग |
| Field Marshal उपाधि | 1 जनवरी 1973 | 1 अप्रैल 1986 |
| प्रमुख युद्ध योगदान | 1971 भारत-पाक युद्ध (बांग्लादेश निर्माण) | 1947 कश्मीर युद्ध |
| ऐतिहासिक उपलब्धि | भारत के पहले Field Marshal | स्वतंत्र भारत के पहले सेनाध्यक्ष |
| प्रमुख पुरस्कार | पद्म विभूषण, मिलिट्री क्रॉस | पद्म विभूषण, लीजन ऑफ मेरिट (USA) |
| जाति/समुदाय | पारसी, गुजराती मूल | कोडवा (कुर्ग) |
| निधन | 27 जून 2008 | 15 मई 1993 |
विरासत — जो आज भी प्रेरणा देती है
इन दो महान Field Marshals की कहानी केवल युद्धों की कहानी नहीं है — यह उस नेतृत्व की कहानी है जो अपने सैनिकों की परवाह करता है, जो राजनेताओं के सामने सत्य बोलने का साहस रखता है और जो देश को अपने से ऊपर रखता है।
सैम मानेकशॉ ने एक बार कहा था कि जब इंदिरा गांधी ने उनसे युद्ध की माँग की, तो उन्होंने साफ कहा — “प्रधानमंत्री जी, अगर आप अभी आदेश देंगी तो हम हारेंगे। मुझे समय चाहिए।” यह साहस — सत्ता के सामने सत्य बोलने का — आज भी हर सैनिक को प्रेरित करता है।
दूसरी ओर, करियप्पा की सादगी और अनुशासन आज भी सैनिक जीवन का आदर्श है। वे हमेशा कहते थे, “सेना का काम सरहद की रक्षा करना है, राजनीति नहीं।” यह सीमारेखा उन्होंने जीवनभर मानी।
नई पीढ़ी के लिए सीख
- तैयारी के बिना युद्ध नहीं — सफलता हमेशा योजना से मिलती है
- सत्ता के सामने सच बोलने का साहस रखें
- अपने सैनिकों / टीम का सम्मान करें — नेतृत्व ऊपर से नहीं, अंदर से आता है
- देश और कर्तव्य को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर रखें
- हास्यबोध और मानवता — कठिन परिस्थितियों में भी इंसान बने रहें
निष्कर्ष — दो तारे, एक आसमान
भारत के दो Field Marshal — सैम मानेकशॉ और के.एम. करियप्पा — भारतीय सैन्य इतिहास के दो ध्रुव तारे हैं। एक ने 1947 में कश्मीर बचाया और स्वतंत्र भारत की सेना को नई पहचान दी, दूसरे ने 1971 में न केवल युद्ध जीता बल्कि एक नए देश का निर्माण किया।
जब भी हम भारतीय सेना के शौर्य की बात करते हैं, जब भी हम अपने तिरंगे को गर्व से देखते हैं — उस गर्व के पीछे इन महान Field Marshals का योगदान है। उनकी कहानियाँ सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि हर उस भारतीय के दिल में जीवित हैं जो अपने देश से प्यार करता है।
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FAQ
भारत में अब तक केवल दो Field Marshal हुए हैं — फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ (1973) और फील्ड मार्शल के.एम. करियप्पा (1986)। यह Field Marshal पद भारतीय थल सेना का सर्वोच्च पाँच-सितारा सम्मान है, जो स्वतंत्र भारत के 75+ वर्षों के इतिहास में मात्र दो बार प्रदान किया गया है — जो इसकी अत्यंत दुर्लभता को दर्शाता है।
भारत के पहले Field Marshal सैम होर्मुसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ थे। उन्हें 1 जनवरी 1973 को यह ऐतिहासिक उपाधि दी गई। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उनके असाधारण नेतृत्व — जिसने बांग्लादेश के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया — के लिए उन्हें भारत सरकार ने इस सर्वोच्च सैन्य सम्मान से सम्मानित किया ।
‘सैम बहादुर’ — यह उपनाम उन्हें उनके सैनिकों और आम जनता ने दिया। ‘बहादुर’ का अर्थ है वीर और साहसी। द्वितीय विश्वयुद्ध में बर्मा के मोर्चे पर उन्हें छह गोलियाँ लगीं, फिर भी वे हिम्मत नहीं हारे। उनका तीखा हास्यबोध, बेबाक अंदाज़ और सैनिकों के प्रति गहरा स्नेह उन्हें सबसे अलग बनाता था। Field Marshal मानेकशॉ पर 2023 में इसी नाम की बॉलीवुड फिल्म भी बनी।
1971 के युद्ध में Field Marshal सैम मानेकशॉ Chief of Army Staff के रूप में सम्पूर्ण सैन्य अभियान की कमान में थे। जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मार्च 1971 में तत्काल युद्ध की माँग की, तो उन्होंने सत्ता के सामने सच बोलने का साहस दिखाते हुए कहा — “अभी नहीं, हम तैयार नहीं।” महीनों की तैयारी के बाद दिसंबर में छिड़े युद्ध में मात्र 13 दिनों में पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया और बांग्लादेश का जन्म हुआ।
भारत में Field Marshal की उपाधि किसे और कैसे दी जाती है?
भारत में Field Marshal की उपाधि किसे और कैसे दी जाती है?▲
Field Marshal की उपाधि भारत सरकार द्वारा दी जाती है और इसके लिए कोई निश्चित मानदंड नहीं है — यह विशुद्ध रूप से असाधारण राष्ट्रीय सेवा और युगांतरकारी सैन्य योगदान पर आधारित है। राष्ट्रपति की अनुशंसा पर, मंत्रिमंडल की सहमति से यह सम्मान प्रदान किया जाता है। इसीलिए यह इतना दुर्लभ है — 75+ वर्षों में केवल दो बार।
15 जनवरी को थल सेना दिवस क्यों मनाया जाता है? इसका Field Marshal करियप्पा से क्या संबंध है?
15 जनवरी 1949 को Field Marshal के.एम. करियप्पा ने ब्रिटिश जनरल सर फ्रांसिस बुचर से भारतीय सेना की कमान संभाली। यह वह ऐतिहासिक क्षण था जब पहली बार किसी भारतीय अधिकारी के हाथ में भारतीय सेना की बागडोर आई। इसी गौरवशाली दिन की स्मृति में हर वर्ष थल सेना दिवस (Army Day) मनाया जाता है। यह दिन भारतीय सेना की स्वायत्तता और आत्मगौरव का प्रतीक है।
सैम मानेकशॉ पर बनी फिल्म का नाम क्या है और इसमें किसने उनकी भूमिका निभाई?
Field Marshal सैम मानेकशॉ के जीवन पर 2023 में “सैम बहादुर” नामक हिंदी फिल्म बनी। इसमें विक्की कौशल ने उनकी अविस्मरणीय भूमिका निभाई और मेघना गुलज़ार ने फिल्म का निर्देशन किया। यह फिल्म मानेकशॉ के जीवन के उतार-चढ़ाव, उनके साहस और 1971 के युद्ध को बखूबी दर्शाती है। इसने नई पीढ़ी को भारत के इस महान Field Marshal की विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

